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تفسیر: Al-Isra ۱۰۰:۱۷

۱۰۰:۱۷
قل لو انتم تملكون خزاين رحمة ربي اذا لامسكتم خشية الانفاق وكان الانسان قتورا ١٠٠
قُل لَّوْ أَنتُمْ تَمْلِكُونَ خَزَآئِنَ رَحْمَةِ رَبِّىٓ إِذًۭا لَّأَمْسَكْتُمْ خَشْيَةَ ٱلْإِنفَاقِ ۚ وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ قَتُورًۭا ١٠٠
قُل
لَّوۡ
أَنتُمۡ
تَمۡلِكُونَ
خَزَآئِنَ
رَحۡمَةِ
رَبِّيٓ
إِذٗا
لَّأَمۡسَكۡتُمۡ
خَشۡيَةَ
ٱلۡإِنفَاقِۚ
وَكَانَ
ٱلۡإِنسَٰنُ
قَتُورٗا
١٠٠
[ای پیامبر، به مشرکان] بگو: «اگر شما مالک گنجینه‌های [بخشش و] رحمتِ پروردگارم بودید، [باز هم] از بیم خرج کردن [و تنگدستی] از انفاق خوداری می‌کردید؛ و انسان همواره بخیل [و تنگ‌نظر] است».
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قیراط
حدیث
О люди! Если бы вы распоряжались неисчерпаемыми сокровищницами Божьей милости, то вы все равно бы скупились одарять других щедротами, опасаясь того, что ваши богатства иссякнут. Вы опасались бы этого, несмотря на то, что богатство Аллаха не может иссякнуть. А объясняется это тем, что человеческой душе свойственна скупость.