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058

Al-Mujadila 58:9 يا ايها الذين امنوا اذا تناجيتم فلا تتناجوا بالاثم والعدوان ومعصيت الرسول وتناجوا بالبر والتقوى واتقوا الله الذي اليه تحشرون ٩

58:9
يَٰٓأَيُّهَا
ٱلَّذِينَ
ءَامَنُوٓاْ
إِذَا
تَنَٰجَيۡتُمۡ
فَلَا
تَتَنَٰجَوۡاْ
بِٱلۡإِثۡمِ
وَٱلۡعُدۡوَٰنِ
وَمَعۡصِيَتِ
ٱلرَّسُولِ
وَتَنَٰجَوۡاْ
بِٱلۡبِرِّ
وَٱلتَّقۡوَىٰۖ
وَٱتَّقُواْ
ٱللَّهَ
ٱلَّذِيٓ
إِلَيۡهِ
تُحۡشَرُونَ
٩
ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! जब तुम कानाफूसी करो, तो पाप तथा अत्याचार एवं रसूल की अवज्ञा की कानाफूसी न करो, बल्कि नेकी तथा तक़वा की कानाफूसी करो, और अल्लाह से डरते रहो, जिसकी ओर तुम एकत्रित किए जाओगे।
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Ibn Kathir (Abridged)

The Evil of the Jews

Ibn Abi Najih reported from Mujahid,

أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نُهُواْ عَنِ النَّجْوَى ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُواْ عَنْهُ

(Have you not seen those who were forbidden to hold secret counsels, and afterwards returned to that which they had been forbidden,) He said, "The Jews." S

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The Evil of the Jews

Ibn Abi Najih reported from Mujahid,

أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نُهُواْ عَنِ النَّجْوَى ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُواْ عَنْهُ

(Have

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Chapter 58, Page 543, Juz 28

5. निश्चय जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे अपमानित किए जाएँगे, जैसे उनसे पहले के लोग अपमानित किए गए। और हमने स्पष्ट आयतें उतार दी हैं। और काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना है। 6. जिस दिन अल्लाह उन सब को जीवित कर उठाएगा, फिर उन्हें बताएगा जो उन्होंने किया। अल्लाह ने उसे संरक्षित कर रखा है और वे उसे भूल गए। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु पर गवाह है। 7. क्या आपने नहीं देखा कि अल्लाह जानता है, जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है? तीन व्यक्तियों की कोई कानाफूसी नहीं होती, परंतु वह (अल्लाह) उनका चौथा होता है। और न पाँच (आदमियों) की, परंतु वह उनका छठा होता है। और न इससे कम और न अधिक की, परंतु वह उनके साथ होता है, वे जहाँ भी हों। फिर वह क़ियामत के दिन उन्हें उनके कर्मों से सूचित कर देगा। निःसंदेह अल्लाह प्रत्येक वस्तु से भली-भाँति अवगत है। 8. क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा, जिन्हें कानाफूसी से रोका गया, फिर वे वही करते हैं, जिससे उन्हें मना किया गया था? तथा आपस में पाप, अत्याचार और रसूल की अवज्ञा की कानाफूसी करते हैं। और जब आपके पास आते हैं, तो आपको (ऐसे शब्दों के साथ) सलाम करते हैं, जिनके साथ अल्लाह ने आपको सलाम नहीं किया। तथा अपने दिलों में कहते हैं : हम जो कुछ कहते हैं, उसपर अल्लाह हमें यातना क्यों नहीं देता? उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी है, जिसमें वे दाखिल होंगे। वह बहुत बुरा ठिकाना है। 9. ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! जब तुम कानाफूसी करो, तो पाप तथा अत्याचार एवं रसूल की अवज्ञा की कानाफूसी न करो, बल्कि नेकी तथा तक़वा की कानाफूसी करो, और अल्लाह से डरते रहो, जिसकी ओर तुम एकत्रित किए जाओगे। 10. यह कानाफूसी तो मात्र शैतान की ओर से है, ताकि वह ईमान वालों को दुखी करे, हालाँकि वह अल्लाह की अनुमति के बिना उन्हें कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचा सकता। और ईमान वालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए। 11. ऐ ईमान वालो! जब तुमसे कहा जाए कि सभाओं में जगह कुशादा कर दो, तो कुशादा कर दिया करो। अल्लाह तुम्हारे लिए विस्तार पैदा करेगा। तथा जब कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो। अल्लाह तुममें से उन लोगों के दर्जे ऊँचे कर देगा, जो ईमान लाए तथा जिन्हें ज्ञान प्रदान किया गया है। तथा तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे भली-भाँति अवगत है। 12. ऐ ईमान वालो! जब तुम रसूल से गुप्त रूप से बात करो, तो गुप्त रूप से बात करने से पहले कुछ दान करो। यह तुम्हारे लिए उत्तम तथा अधिक पवित्र है। फिर यदि तुम (दान के लिए कुछ) न पाओ, तो अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान् है। 13. क्या तुम इससे डर गए कि अपनी गुप्त रूप से बात-चीत से पहले कुछ दान करो? सो, जब तुमने ऐसा नहीं किया और अल्लाह ने तुम्हें क्षमा कर दिया, तो नमाज़ कायम करो तथा ज़कात दो और अल्लाह तथा उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे पूरी तरह अवगत है।

- Maulana Azizul Haque al-Umari

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