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040

Ghafir 40:34 ولقد جاءكم يوسف من قبل بالبينات فما زلتم في شك مما جاءكم به حتى اذا هلك قلتم لن يبعث الله من بعده رسولا كذالك يضل الله من هو مسرف مرتاب ٣٤

40:34
وَلَقَدۡ
جَآءَكُمۡ
يُوسُفُ
مِن
قَبۡلُ
بِٱلۡبَيِّنَٰتِ
فَمَا
زِلۡتُمۡ
فِي
شَكّٖ
مِّمَّا
جَآءَكُم
بِهِۦۖ
حَتَّىٰٓ
إِذَا
هَلَكَ
قُلۡتُمۡ
لَن
يَبۡعَثَ
ٱللَّهُ
مِنۢ
بَعۡدِهِۦ
رَسُولٗاۚ
كَذَٰلِكَ
يُضِلُّ
ٱللَّهُ
مَنۡ
هُوَ
مُسۡرِفٞ
مُّرۡتَابٌ
٣٤
तथा इससे पूर्व यूसुफ़ तुम्हारे पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए, तो तुम उस चीज़ के बारे में बराबर संदेह में पड़े रहे, जो वह तुम्हारे पास लेकर आए। यहाँ तक कि जब वह मर गए, तो तुमने कहा कि अल्लाह उनके पश्चात् कोई रसूल1 हरगिज़ नहीं भेजेगा। इसी प्रकार अल्लाह उसे राह से भटका देता है, जो हद से बढ़ने वाला, संदेह करने वाला हो।
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Ibn Kathir (Abridged)

يقَوْمِ إِنِّى أَخَافُ عَلَيْكُمْ مِّثْلَ يَوْمِ الاٌّحْزَابِ

(O my people! Verily, I fear for you an end like that day (of disaster) of the groups (of old)!) meaning, those of the earlier nations who disbelieved the Messengers of Allah, such as the people of Nuh, `Ad, Thamud and the disbelieving nat

…

يقَوْمِ إِنِّى أَخَافُ عَلَيْكُمْ مِّثْلَ يَوْمِ الاٌّحْزَابِ

(O my people! Verily, I fear for you an end like that day (of disaster) of the groups (of

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Chapter 40, Page 471, Juz 24

28. तथा फ़िरऔन के घराने के एक ईमानवाले व्यक्ति ने, जो अपना ईमान छिपा रहा था, कहा : क्या तुम एक व्यक्ति को केवल इसलिए मार डालना चाहते हो कि वह कहता है कि मेरा पालनहार अल्लाह है, जबकि वह तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से खुली निशानियाँ लेकर आया है? और यदि वह झूठा है, तो उसका झूठ उसी के ऊपर है और यदि वह सच्चा है, तो तुम्हें उस (यातना) का कुछ अंश पहुँचकर रहेगा, जिसका वह तुमसे वादा कर रहा है। निःसंदेह अल्लाह उसका मार्गदर्शन नहीं करता, जो उल्लंघनकारी, बहुत झूठा है। 29. ऐ मेरी जाति के लोगो! आज तुम्हारा राज्य है। तुम धरती में प्रभावशाली हो। यदि अल्लाह की यातना हमपर आ जाए, तो उससे बचाने के लिए कौन हमारी मदद करेगा? फ़िरऔन ने कहा : मैं तुम सब को वही समझा रहा हूँ, जिसे मैं उचित समझता हूँ और मैं तुम्हें सीधी राह ही दिखा रहा हूँ। 30. तथा जो व्यक्ति ईमान लाया था, उसने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुमपर (अगले) समुदायों के दिन जैसे (दिन) से डरता हूँ। 31. नूह की जाति, तथा आद और समूद और उनके बाद होने वाले लोगों की स्थिति के समान। तथा अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार नहीं चाहता। 32. तथा ऐ मेरी जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुमपर एक-दूसरे को पुकारने के दिन से डरता हूँ। 33. जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे। तुम्हें अल्लाह से कोई बचाने वाला न होगा। तथा जिसे अल्लाह राह से भटका दे, उसे राह दिखाने वाला कोई नहीं। 34. तथा इससे पूर्व यूसुफ़ तुम्हारे पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए, तो तुम उस चीज़ के बारे में बराबर संदेह में पड़े रहे, जो वह तुम्हारे पास लेकर आए। यहाँ तक कि जब वह मर गए, तो तुमने कहा कि अल्लाह उनके पश्चात् कोई रसूल हरगिज़ नहीं भेजेगा। इसी प्रकार अल्लाह उसे राह से भटका देता है, जो हद से बढ़ने वाला, संदेह करने वाला हो। 35. जो अल्लाह की आयतों के बारे में झगड़ते हैं, बिना किसी प्रमाण के, जो उनके पास आया हो। यह अल्लाह के निकट तथा उन लोगों के निकट, जो ईमान लाए हैं, बड़े क्रोध की बात है। इसी प्रकार, अल्लाह प्रत्येक अहंकारी अत्याचारी के दिल पर मुहर लगा देता है। 36. तथा फ़िरऔन ने कहा : ऐ हामान! मेरे लिए एक उच्च भवन बनाओ, ताकि मैं मार्गों तक पहुँच सकूँ। 37. आकाशों के मार्गों तक। फिर मैं मूसा के पूज्य को देख लूँ। और निश्चय ही मैं उसे झूठा समझता हूँ। इसी प्रकार, फ़िरऔन के लिए उसके बुरे कर्म को सुंदर बना दिया गया और उसे सत्य मार्ग से रोक दिया गया। और फ़िरऔन की चाल विनाश होकर रही।

- Maulana Azizul Haque al-Umari

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